शनिवार, 22 जुलाई 2017

ओ माँझी!

ओ माँझी!
यूँ न बचाओ नैया
क्यूँ इतनी चतुर चलाओ पतवार?
जरा डूब लेने दो
टक्कर लहरों से खूब लेने दो
सागर की इन चपल,
क्रूर चालों से
मैं भी होऊँ दो-चार
जरा मैं भी तो देखूँ
कितने नाविक,कितनी बार
कैसे जाते हार!

ओ माँझी!
इन भँवरों से
न मुझे हटाओ बारम्बार
जरा परख लेने दो
चिरस्थायी विज्ञान से
शर्त लेने दो
इस असीम,अलंघ्य जल-राशि से
खुद ही जाऊँ पार
जरा मैं भी तो जानूँ
कहाँ खुलते हैं तट के द्वार
कैसे जायें पार!

ओ माँझी!
आगाह न करो
न दिखाओ जल का ज्वार
जरा होड़ लेने दो
सिंधूर्मि-मद तोड़ लेने दो
गर्जन के कोलाहल-स्वर से
सुन लूँ मधुर संगीत-स्वर-सार
जरा मैं भी तो निरखुँ
कहाँ मिलता है जय का सार
कब पहनाती हार!

अरविन्द सांध्यगीत

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