बादल:-कवि
कवि:-बादल
दर्द बादल का किसने देखा
किसने देखी मौन व्यथा?
कब कैसे निर्माण हुआ
कब उठा चला और फिर टूटा?
सह-सह ताप रूप धरा
संग समीर उड़ान भरी
तब लोगों ने जीवन माना
आशाएँ घन पर धरी
कितना घुटा कितना गरजा
तिस पर भी थे जन आह्लादित
तड़क-तड़ककर प्लावित होती
कवि-उर में चपला चपलित
घनीभूत पीड़ा के क्षण में
स्वतः स्फूर्त काव्य-जल-कण
फलित-स्मित-सा इस पर भी
सकल सृष्टि का जन-मन
जिसको क्षणिक करुणा उमड़े
स्थित नहीं कोई अपवाद
बरसो बरसो और बरसो
चतुर्दिक गुञ्जित एक आवाज
सघन श्याम जब कष्ट हुए
टूटा बाँध हुआ मुसलाधार
वाह रे निर्मम हृदयहीन जग!
तुमने की करतल बौछार
अश्रु बरसे लेखनी बरसी
नाना रंग-रंगीले छंद
शस्य-श्यामल हुए कहीं पर
हुए कहीं मधुर मकरंद!
अरविन्द सांध्यगीत
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