जटाजूटधारी का आज
धाराधर करते अभिषेक
गर्जन के मंत्रोच्चारण से
ढुलकाते हैं जल अविवेक
दिनकर की दीप्ति से दीप्त
सजा धनुष नभ-प्रांगण में
सतरंगी में रक्तवर्ण जैसे
पिया लहू समरांगण में
वृक्षों की शाखाएँ हिलती
ज्यों तने हुए हो बंदनवार
प्रेम-प्रवाह में सुध-बुध खोकर
हो रहे बादल मुसलाधार
द्रुमदल के स्तंभों से टकरा
जल की धारा बहती कलकल
ये संगीत कुछ ऐसा है
जैसे बूंदें गाती हो मंगल
रक्तवर्ण से रंगा हुआ जो
त्रिपुरारि का महाचाप
अगणित मेघों के संग स्वयं
अमरपति धो रहे हो आप
यही लाली फिर बिखर गई है
रेगिस्तानी टीलों पर
उन पर से चेहरे पर आई
कृषक कुटुंब-कबीलों पर
नीलकंठ के इस आदर पर
देखो नीलकंठ केकारत
जैसे आज पूरा हुआ है
चिरकालीन इनका कोई व्रत
सबसे अधिक झर रहे हैं
सकल गाँव के तरु-अश्वत्थ
पशुपति का प्रेम-प्रवाह
कर गया ज्यों भावुक व श्लथ!
अरविन्द सांध्यगीत
धाराधर करते अभिषेक
गर्जन के मंत्रोच्चारण से
ढुलकाते हैं जल अविवेक
दिनकर की दीप्ति से दीप्त
सजा धनुष नभ-प्रांगण में
सतरंगी में रक्तवर्ण जैसे
पिया लहू समरांगण में
वृक्षों की शाखाएँ हिलती
ज्यों तने हुए हो बंदनवार
प्रेम-प्रवाह में सुध-बुध खोकर
हो रहे बादल मुसलाधार
द्रुमदल के स्तंभों से टकरा
जल की धारा बहती कलकल
ये संगीत कुछ ऐसा है
जैसे बूंदें गाती हो मंगल
रक्तवर्ण से रंगा हुआ जो
त्रिपुरारि का महाचाप
अगणित मेघों के संग स्वयं
अमरपति धो रहे हो आप
यही लाली फिर बिखर गई है
रेगिस्तानी टीलों पर
उन पर से चेहरे पर आई
कृषक कुटुंब-कबीलों पर
नीलकंठ के इस आदर पर
देखो नीलकंठ केकारत
जैसे आज पूरा हुआ है
चिरकालीन इनका कोई व्रत
सबसे अधिक झर रहे हैं
सकल गाँव के तरु-अश्वत्थ
पशुपति का प्रेम-प्रवाह
कर गया ज्यों भावुक व श्लथ!
अरविन्द सांध्यगीत
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