गुरुवार, 27 जुलाई 2017

हे स्रोतस्विनी!



हे स्रोतस्विनी!
अब बह जाओ
तुम्हें बहना है तो
कोई और तह लाओ
बलात् रोकूं कब तक
तुमको
हे सरस शीतल सलिला
तुम ठहर गई हो
तो हो गई हो पंकिल
फिर भी तनिक देखो मुझे
मुझे जलजात स्वीकार्य है
जलकुंभी के भय से
ये जन तुमको नहीं रहने देंगे
ये फावड़े,कुदालियों की फाल
आँखे तरेरती तुम पर
कि जाओ तुम
हम स्वच्छ करें
यह धूसर गंदली सतह
बहादें इस भूमि पर
कल-कल करती कोई धारा
उससे सींचे फिर अपने
स्वार्थों के लंबे खेत
ऊँचे कद वाली फसलें
बने भले उर्वर ऊसर
पहले पहल राह करने वाली
काम्य तेरी निर्मम विस्मृति
हे प्रथम सुस्वादु सरित-धार
श्रेय छोड़ो तुम हेय हुई हो
तो ये तल छोड़ो
इसी में सार!

अरविन्द सांध्यगीत

बुधवार, 26 जुलाई 2017

बादल का दर्द



 बादल:-कवि
कवि:-बादल

दर्द बादल का किसने देखा
किसने देखी मौन व्यथा?
कब कैसे निर्माण हुआ
कब उठा चला और फिर टूटा?
सह-सह ताप रूप धरा
संग समीर उड़ान भरी
तब लोगों ने जीवन माना
आशाएँ घन पर धरी
कितना घुटा कितना गरजा
तिस पर भी थे जन आह्लादित
तड़क-तड़ककर प्लावित होती
कवि-उर में चपला चपलित
घनीभूत पीड़ा के क्षण में
स्वतः स्फूर्त काव्य-जल-कण
फलित-स्मित-सा इस पर भी
सकल सृष्टि का जन-मन
जिसको क्षणिक करुणा उमड़े
स्थित नहीं कोई अपवाद
बरसो बरसो और बरसो
चतुर्दिक गुञ्जित एक आवाज
सघन श्याम जब कष्ट हुए
टूटा बाँध हुआ मुसलाधार
वाह रे निर्मम हृदयहीन जग!
तुमने की करतल बौछार
अश्रु बरसे लेखनी बरसी
नाना रंग-रंगीले छंद
शस्य-श्यामल हुए कहीं पर
हुए कहीं मधुर मकरंद!

अरविन्द सांध्यगीत

शनिवार, 22 जुलाई 2017

ओ माँझी!

ओ माँझी!
यूँ न बचाओ नैया
क्यूँ इतनी चतुर चलाओ पतवार?
जरा डूब लेने दो
टक्कर लहरों से खूब लेने दो
सागर की इन चपल,
क्रूर चालों से
मैं भी होऊँ दो-चार
जरा मैं भी तो देखूँ
कितने नाविक,कितनी बार
कैसे जाते हार!

ओ माँझी!
इन भँवरों से
न मुझे हटाओ बारम्बार
जरा परख लेने दो
चिरस्थायी विज्ञान से
शर्त लेने दो
इस असीम,अलंघ्य जल-राशि से
खुद ही जाऊँ पार
जरा मैं भी तो जानूँ
कहाँ खुलते हैं तट के द्वार
कैसे जायें पार!

ओ माँझी!
आगाह न करो
न दिखाओ जल का ज्वार
जरा होड़ लेने दो
सिंधूर्मि-मद तोड़ लेने दो
गर्जन के कोलाहल-स्वर से
सुन लूँ मधुर संगीत-स्वर-सार
जरा मैं भी तो निरखुँ
कहाँ मिलता है जय का सार
कब पहनाती हार!

अरविन्द सांध्यगीत


परस्पर दूर नहीं होंगे इतने ये शुभ्रज्योति तारे
जितनी दूरियाँ प्रिये!मध्य में आपके और हमारे!

अरविन्द सांध्यगीत

गुरुवार, 20 जुलाई 2017

सांध्यगीत...?

पूछा हर किसी ने कि
ये सांध्यगीत क्या है,कौन है?
अवतरण चिह्न से आवृत
ये मुख्य है तो क्या अरविन्द गौण है?
चंचल चितेरे-चित की
ये है कोई विज्ञता
सहृदय दिल वाले की
ये है कोई कृतज्ञता
सांध्यगीत और अरविन्द मिलकर ही
अरविन्द 'सांध्यगीत'है
दोनों के सहअस्तित्व से ही
परिभाषित ये सटीक है!

अरविन्द सांध्यगीत

शिव-अभिषेक

जटाजूटधारी का आज
धाराधर करते अभिषेक
गर्जन के मंत्रोच्चारण से
ढुलकाते हैं जल अविवेक
दिनकर की दीप्ति से दीप्त
सजा धनुष नभ-प्रांगण में
सतरंगी में रक्तवर्ण जैसे
पिया लहू समरांगण में
वृक्षों की शाखाएँ हिलती
ज्यों तने हुए हो बंदनवार
प्रेम-प्रवाह में सुध-बुध खोकर
हो रहे बादल मुसलाधार
द्रुमदल के स्तंभों से टकरा
जल की धारा बहती कलकल
ये संगीत कुछ ऐसा है
जैसे बूंदें गाती हो मंगल
रक्तवर्ण से रंगा हुआ जो
त्रिपुरारि का महाचाप
अगणित मेघों के संग स्वयं
अमरपति धो रहे हो आप
यही लाली फिर बिखर गई है
रेगिस्तानी टीलों पर
उन पर से चेहरे पर आई
कृषक कुटुंब-कबीलों पर
नीलकंठ के इस आदर पर
देखो नीलकंठ केकारत
जैसे आज पूरा हुआ है
चिरकालीन इनका कोई व्रत
सबसे अधिक झर रहे हैं
सकल गाँव के तरु-अश्वत्थ
पशुपति का प्रेम-प्रवाह
कर गया ज्यों भावुक व श्लथ!

अरविन्द सांध्यगीत

विधु-वधु प्रथम हास भृकुटि-विलास चन्द्र-हृदय पर छा गई अम्बर के आँगन में देखो विधु-वधु वह आ गई। बरसाती बादल से धुलकर चन्दन का उबटन मल...