हे स्रोतस्विनी!
अब बह जाओ
तुम्हें बहना है तो
कोई और तह लाओ
बलात् रोकूं कब तक
तुमको
हे सरस शीतल सलिला
तुम ठहर गई हो
तो हो गई हो पंकिल
फिर भी तनिक देखो मुझे
मुझे जलजात स्वीकार्य है
जलकुंभी के भय से
ये जन तुमको नहीं रहने देंगे
ये फावड़े,कुदालियों की फाल
आँखे तरेरती तुम पर
कि जाओ तुम
हम स्वच्छ करें
यह धूसर गंदली सतह
बहादें इस भूमि पर
कल-कल करती कोई धारा
उससे सींचे फिर अपने
स्वार्थों के लंबे खेत
ऊँचे कद वाली फसलें
बने भले उर्वर ऊसर
पहले पहल राह करने वाली
काम्य तेरी निर्मम विस्मृति
हे प्रथम सुस्वादु सरित-धार
श्रेय छोड़ो तुम हेय हुई हो
तो ये तल छोड़ो
इसी में सार!
अरविन्द सांध्यगीत