गुरुवार, 3 अगस्त 2017

संध्या की संधि में साधे साधक बनकर कितने गीत
नाम रखकर सांध्यगीत बोलो क्या काम किया अलीक?
अरविन्द सांध्यगीत
संपर्क सूत्र:-8696279384
मैं कबसे खुद को
किए हुए हूँ कवि
और तुम सब नासमझ
समझ रहे हो केवल रवि
हुई भोर
लाया शीतलता
चढा दिन
हुआ तेजयुक्त
कहीं सूखा दिए कपड़े
कहीं फसलों पर पानी ले आया
चला दिए कहीं कुएँ
खींच लाया
बरबस बादलों को
और जब ओट हुई उनकी
तुम ही करने लगे संदेह
मेरी क्षमता
मेरे तेज पर
अरे भाई...!
आखिर मैं कवि हूँ
कह रहा हूँ.....
नहीं खाली रवि हूँ
माना कि सृजन ही
रवि का कर्म है
पुनः अनुसृजन ही धर्म है
वो भी तो चाहेगा प्रतिफल
होगा कोई उसका भी ध्येय
जाना है उसे क्षितिज तक
तो ढलना तो पड़ेगा ही
मिलना है जो साँझ-सखी से
तो चलना तो पड़ेगा ही
बाकी ये चिंताएँ तुम्हारी
सब व्यर्थ है
इन सबमें इसका
नहीं कोई कदर्थ है
पल दो पल को ठहर क्षितिज
क्षणिक सुख पायेगा
देख प्रियतमा संध्या को
फूर्त आगे बढ जायेगा
मत सोचो.....
मैं कह रहा हूँ
नहीं ये रास रचायेगा
क्योंकि.......
ये तो रवि की नियति नहीं है
साँझ-सखी और रवि की
साथ में कोई गति नहीं है
तुम सबको आलोकित करने
कल आ ही जायेगा फिर
अभी कहीं और भी
तम हरना है
प्राची पर पुनः आयेगा कल
उषा से ही घिर!

अरविन्द सांध्यगीत
संपर्क सूत्रः-८६९६२७९३८४
क्या तुम चाहते हो कि कोई जीवन भर बस गीत लिखे
कविताओं में केवल तेरी प्रीत और बस प्रीत लिखे
तो तुम ये भी सोचो कि क्या एकतरफा ये संभव है
बिन बरसे भूमि पर उगना बीजों का क्या संभव है!

अरविन्द सांध्यगीत
संपर्क सूत्रः-८६९६२७९३८४

साभार दैनिक युगपक्ष


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